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Holash kumar

पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास: विभिन्न वैज्ञानिक संकल्पनाओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन

पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति का प्रश्न मानव इतिहास के सबसे रहस्यमय और बौद्धिक रूप से उत्तेजक विषयों में से एक रहा है। आरंभिक काल में जहाँ इस विषय पर धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं का प्रभुत्व था, वहीं 18वीं शताब्दी के मध्य से इस दिशा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। 1749 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्ते-द-बफन (Comte de Buffon) द्वारा प्रस्तुत तर्कपूर्ण परिकल्पना को इस दिशा में पहला वैज्ञानिक कदम माना जाता है। समय के साथ विभिन्न खगोलविदों और गणितज्ञों ने अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए, जिन्हें मुख्य रूप से दो वैचारिक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: अद्वैतवादी (Monistic) और द्वैतवादी (Dualistic) संकल्पनाएँ।

1. अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic / Parental Hypothesis)

इस विचारधारा के अनुसार, संपूर्ण सौरमंडल (सूर्य, ग्रह और उपग्रह) का निर्माण अंतरिक्ष में मौजूद केवल एक ही आद्य पिंड (एक तारे या निहारिका) से हुआ है। यह संकल्पना विकासवादी दृष्टिकोण पर आधारित है, जहाँ क्रमिक परिवर्तनों से ग्रहों का निर्माण होता है।

कांट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant's Gaseous Hypothesis, 1755):

जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांट ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियमों का उपयोग करते हुए यह सिद्धांत दिया। उनके अनुसार, ब्रह्मांड में पहले से ही आद्य पदार्थ (Primordial matter) मौजूद था जो ठंडा और गतिहीन था। गुरुत्वाकर्षण के कारण ये कण आपस में टकराने लगे, जिससे ऊष्मा और घूर्णन गति (Rotational velocity) उत्पन्न हुई। यह तप्त और गतिशील गैसीय बादल 'निहारिका' (Nebula) कहलाया। जैसे-जैसे निहारिका की गति बढ़ी, अपकेंद्री बल (Centrifugal force) के कारण इसके मध्य भाग से छल्ले (Rings) अलग होने लगे। इन्हीं छल्लों के ठंडे होने और संघनित होने से ग्रहों का निर्माण हुआ।

आलोचना:
  • गणितीय रूप से यह सिद्धांत त्रुटिपूर्ण माना गया क्योंकि यह कोणीय संवेग के संरक्षण (Conservation of Angular Momentum) के नियम का उल्लंघन करता है।
  • आपसी टकराव से इतनी तीव्र घूर्णन गति उत्पन्न नहीं हो सकती।

लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Laplace's Nebular Hypothesis, 1796):

फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने कांट के सिद्धांत की कमियों को दूर करने का प्रयास किया। लाप्लास ने माना कि अंतरिक्ष में पहले से ही एक विशाल, तप्त और तेजी से घूमती हुई निहारिका मौजूद थी। विकिरण के कारण ऊष्मा में कमी आने से निहारिका सिकुड़ने लगी, जिससे उसका आकार छोटा हो गया और घूर्णन गति अत्यधिक बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप, विषुवत रेखा से एक ही बड़ा छल्ला बाहर निकला, जो बाद में टूटकर कई छोटे छल्लों में विभाजित हो गया। इन्हीं के शीतलन से ग्रहों का निर्माण हुआ।

आलोचना:
  • इस सिद्धांत के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों को अपने पितृ ग्रह की दिशा में घूमना चाहिए, लेकिन शनि और बृहस्पति के कुछ उपग्रह विपरीत दिशा में परिक्रमा करते हैं।
  • इसके अलावा, सूर्य के पास वर्तमान में इतना कोणीय संवेग नहीं है जो इस सिद्धांत को सही ठहरा सके।

2. द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic / Bi-Parental Hypothesis)

इस विचारधारा के अनुसार ग्रहों की उत्पत्ति केवल एक तारे से न होकर, कम से कम दो तारों (सूर्य और एक अन्य साथी या आगंतुक तारा) के गुरुत्वाकर्षण और ज्वारीय अंतःक्रिया (Tidal interaction) के परिणामस्वरूप हुई है।

चैम्बरलिन और मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis, 1905):

इस सिद्धांत के अनुसार, एक विशाल 'आगंतुक तारा' सूर्य के करीब से गुजरा। इस विशाल तारे की उच्च गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण सूर्य के धरातल से असंख्य छोटे-छोटे कण (ग्रहाणु या Planetesimals) बाहर निकल गए। जब आगंतुक तारा दूर चला गया, तो ये कण सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करने लगे। इन्हीं कणों के आपस में टकराने और जुड़ने (Accretion) से पृथ्वी और अन्य ग्रहों का निर्माण हुआ। यह सिद्धांत ठोस कणों से ग्रहों के निर्माण की बात करता है, न कि गैस से।

जेम्स जींस और हेरोल्ड जेफरीज की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis, 1919/1921):

यह सर्वाधिक चर्चित सिद्धांतों में से एक है। इसके अनुसार, सूर्य के पास से एक अत्यंत विशाल तारा गुजरा। इस तारे के गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य की सतह पर भयंकर ज्वार उत्पन्न हुआ। जैसे-जैसे तारा करीब आया, सूर्य से एक सिगार के आकार का गैसीय पदार्थ बाहर की ओर खिंच गया, जिसे 'फिलामेंट' (Filament) कहा गया। तारे के दूर जाने पर यह फिलामेंट सूर्य से अलग हो गया और टूटकर ग्रहों में बदल गया। सिगार का आकार (बीच में मोटा, किनारों पर पतला) यह स्पष्ट करता है कि बीच के ग्रह (जैसे बृहस्पति, शनि) बड़े हैं, जबकि किनारे के ग्रह (बुध, प्लूटो) छोटे हैं।

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis):

रसेल ने जींस और जेफरीज की परिकल्पना में संशोधन किया। उन्होंने माना कि आरंभ में सूर्य के साथ उसका एक साथी तारा (Companion star) भी था (द्वैतारक प्रणाली)। जब एक तीसरा विशाल तारा इस साथी तारे के पास आया, तो साथी तारे से ज्वारीय उद्भेदन हुआ। इससे ग्रहों का निर्माण हुआ। यह सिद्धांत सूर्य और ग्रहों के बीच की दूरी तथा ग्रहों के उच्च कोणीय संवेग (Angular Momentum) की वैज्ञानिक व्याख्या करने में अधिक सफल रहा।

3. आधुनिक और जटिल परिकल्पनाएँ

ऑटो श्मिट की अंतरतारक धूल परिकल्पना (Inter-Stellar Dust Theory, 1943):

रूसी वैज्ञानिक श्मिट ने ग्रहों की उत्पत्ति को गैस और धूल कणों से जोड़ा। उनके अनुसार, जब सूर्य आकाशगंगा के करीब से गुजर रहा था, तो उसने अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से कुछ गैसीय मेघ और धूल कणों को अपनी ओर आकर्षित किया। ये कण सूर्य की परिक्रमा करने लगे और कालक्रम में संघनित होकर ग्रहों में बदल गए। यह सिद्धांत विभिन्न ग्रहों की संरचना में अंतर (आंतरिक ठोस ग्रह और बाह्य गैसीय ग्रह) और उनकी सूर्य से दूरी को भली-भांति समझाता है।

फ्रेड हॉयल व लिटिलटन की सुपरनोवा / अभिनव तारा परिकल्पना (1939):

हॉयल ने नाभिकीय भौतिकी (Nuclear Physics) का उपयोग करते हुए 'Nature of the Universe' में अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया। इनके अनुसार, सूर्य का एक साथी तारा था, जो एक 'सुपरनोवा' (Supernova) था। इस साथी तारे में भयंकर विस्फोट हुआ और इसके मलबे से ग्रहों का निर्माण हुआ। यह सिद्धांत यह समझाने में सर्वाधिक सक्षम है कि ग्रहों का घनत्व सूर्य से इतना अधिक क्यों है (क्योंकि भारी तत्वों का निर्माण सुपरनोवा विस्फोट में ही होता है) और ग्रहों की सूर्य से दूरी तथा उनका कोणीय संवेग इतना अधिक क्यों है।


महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1: पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित 'अद्वैतवादी' और 'द्वैतवादी' संकल्पनाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  • 1. कांट और लाप्लास की परिकल्पनाएँ अद्वैतवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं।
  • 2. द्वैतवादी संकल्पना में ग्रहों के निर्माण के लिए सूर्य के साथ किसी अन्य तारे की उपस्थिति को अनिवार्य नहीं माना गया है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
A) केवल 1
B) केवल 2
C) 1 और 2 दोनों
D) न तो 1, न ही 2

उत्तर: A (केवल 1)

प्रश्न 2: कोणीय संवेग (Angular Momentum) के संरक्षण और ग्रहों के घनत्व की समस्या का सर्वाधिक वैज्ञानिक रूप से समाधान करने वाली 'सुपरनोवा परिकल्पना' (Supernova Hypothesis) का प्रतिपादन किसने किया था?

A) जेम्स जींस और जेफरीज
B) रसेल और ऑटो श्मिट
C) फ्रेड हॉयल और लिटिलटन
D) चैम्बरलिन और मोल्टन

उत्तर: C (फ्रेड हॉयल और लिटिलटन)

प्रश्न 3: 'सिगार' के आकार के फिलामेंट के टूटने से ग्रहों की उत्पत्ति (जिसमें मध्य के ग्रह विशाल और किनारों के ग्रह छोटे होते हैं) का सिद्धांत किस परिकल्पना का मूल आधार है?

A) ग्रहाणु परिकल्पना (Planetesimal Hypothesis)
B) ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis)
C) अंतरतारक धूल परिकल्पना (Inter-Stellar Dust Theory)
D) निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis)

उत्तर: B (ज्वारीय परिकल्पना)

मुख्य वर्णनात्मक अभ्यास प्रश्न (Descriptive Practice Questions)

प्रश्न 1: अद्वैतवादी और द्वैतवादी संकल्पनाओं के बीच मूलभूत सैद्धांतिक अंतर को स्पष्ट करते हुए, ग्रहों की उत्पत्ति में 'कोणीय संवेग (Angular Momentum)' की समस्या का मूल्यांकन करें।

Short Answer Summary:
  • इस उत्तर में सर्वप्रथम अद्वैतवादी (एकल पिंड या निहारिका से ग्रहों की उत्पत्ति, जैसे कांट-लाप्लास) और द्वैतवादी (दो या अधिक तारों के बीच गुरुत्वाकर्षण/ज्वारीय अंतःक्रिया, जैसे जींस-जेफरीज, रसेल) संकल्पनाओं के मध्य विभेद करना चाहिए।
  • इसके पश्चात कोणीय संवेग की समस्या को स्पष्ट करें: अद्वैतवादी सिद्धांतों (विशेषकर लाप्लास) के अनुसार सूर्य के पास कुल द्रव्यमान का 99% हिस्सा है, लेकिन सौरमंडल का कुल कोणीय संवेग ग्रहों में (लगभग 98%) निहित है। एक ही निहारिका से बने होने पर सूर्य की घूर्णन गति अत्यंत तीव्र होनी चाहिए थी।
  • इस विसंगति को दूर करने के लिए द्वैतवादी और आधुनिक सिद्धांतों (जैसे रसेल की द्वैतारक प्रणाली और हॉयल की सुपरनोवा परिकल्पना) ने यह स्पष्ट किया कि ग्रहों का निर्माण किसी अन्य तारे के मलबे या ज्वारीय उद्भेदन से हुआ है, जिससे उनका कोणीय संवेग सूर्य से स्वतंत्र रूप से अधिक हो सका।

प्रश्न 2: पृथ्वी की उत्पत्ति और सौरमंडल की संरचना के संदर्भ में फ्रेड हॉयल और ऑटो श्मिट की आधुनिक परिकल्पनाओं ने किस प्रकार पारंपरिक सिद्धांतों की कमियों (जैसे ग्रहों का घनत्व और दूरी) को दूर किया? विश्लेषणात्मक विवरण दें।

Short Answer Summary:
  • उत्तर की शुरुआत पारंपरिक सिद्धांतों (कांट, लाप्लास, जींस) की कमियों से करें जो यह नहीं समझा सके कि सूर्य मुख्यतः हल्की गैसों (हाइड्रोजन, हीलियम) से बना है जबकि आंतरिक ग्रह भारी और ठोस तत्वों से क्यों बने हैं।
  • ऑटो श्मिट की 'अंतरतारक धूल परिकल्पना' बताती है कि सूर्य ने अंतरिक्ष से धूल और गैस को आकर्षित किया। भारी कण सूर्य के करीब एकत्रित होकर ठोस ग्रहों (पृथ्वी आदि) में बदल गए, जबकि हल्की गैसें दूर जाकर गैसीय ग्रहों में बदल गईं।
  • दूसरी ओर, फ्रेड हॉयल की 'सुपरनोवा परिकल्पना' नाभिकीय भौतिकी के आधार पर सिद्ध करती है कि भारी तत्वों (लोहा, निकल आदि) का निर्माण केवल सुपरनोवा विस्फोट के अत्यधिक तापमान में ही संभव है। अतः साथी तारे के विस्फोट से भारी तत्वों का निर्माण हुआ, जिससे उच्च घनत्व वाले ग्रहों का निर्माण हुआ और विस्फोट के धक्के ने ग्रहों को सूर्य से वर्तमान दूरी पर स्थापित कर दिया।
  • इस प्रकार दोनों सिद्धांतों ने पारंपरिक कमियों का तार्किक समाधान प्रस्तुत किया।

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