पृथ्वी और सौरमंडल की उत्पत्ति का प्रश्न मानव इतिहास के सबसे रहस्यमय और बौद्धिक रूप से उत्तेजक विषयों में से एक रहा है। आरंभिक काल में जहाँ इस विषय पर धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं का प्रभुत्व था, वहीं 18वीं शताब्दी के मध्य से इस दिशा में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हुआ। 1749 में फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्ते-द-बफन (Comte de Buffon) द्वारा प्रस्तुत तर्कपूर्ण परिकल्पना को इस दिशा में पहला वैज्ञानिक कदम माना जाता है। समय के साथ विभिन्न खगोलविदों और गणितज्ञों ने अपने सिद्धांत प्रस्तुत किए, जिन्हें मुख्य रूप से दो वैचारिक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: अद्वैतवादी (Monistic) और द्वैतवादी (Dualistic) संकल्पनाएँ।
1. अद्वैतवादी संकल्पना (Monistic / Parental Hypothesis)
इस विचारधारा के अनुसार, संपूर्ण सौरमंडल (सूर्य, ग्रह और उपग्रह) का निर्माण अंतरिक्ष में मौजूद केवल एक ही आद्य पिंड (एक तारे या निहारिका) से हुआ है। यह संकल्पना विकासवादी दृष्टिकोण पर आधारित है, जहाँ क्रमिक परिवर्तनों से ग्रहों का निर्माण होता है।
- कांट की वायव्य राशि परिकल्पना (1755): जर्मन दार्शनिक इमैनुअल कांट ने न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण नियमों पर आधारित यह सिद्धांत दिया। उनके अनुसार, अंतरिक्ष में मौजूद आद्य पदार्थ के टकराव से एक तप्त और गतिशील गैसीय बादल 'निहारिका' बना। अपकेंद्री बल के कारण इसके मध्य भाग से छल्ले अलग हुए, जिनके संघनन से ग्रहों का निर्माण हुआ। (आलोचना: यह कोणीय संवेग के संरक्षण नियम का उल्लंघन करता है)।
- लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (1796): फ्रांसीसी गणितज्ञ लाप्लास ने माना कि अंतरिक्ष में पहले से ही एक विशाल, तप्त और तेजी से घूमती हुई निहारिका मौजूद थी। शीतलन से सिकुड़ने के कारण घूर्णन गति बढ़ी और विषुवत रेखा से एक बड़ा छल्ला बाहर निकला, जो टूटकर ग्रहों में बदल गया। (आलोचना: ग्रहों के उपग्रहों की विपरीत दिशा में परिक्रमा और सूर्य का कम कोणीय संवेग)।
2. द्वैतवादी संकल्पना (Dualistic / Bi-Parental Hypothesis)
इस विचारधारा के अनुसार ग्रहों की उत्पत्ति केवल एक तारे से न होकर, कम से कम दो तारों (सूर्य और एक अन्य साथी या आगंतुक तारा) के गुरुत्वाकर्षण और ज्वारीय अंतःक्रिया (Tidal interaction) के परिणामस्वरूप हुई है।
- चैम्बरलिन और मोल्टन की ग्रहाणु परिकल्पना (1905): एक विशाल 'आगंतुक तारा' सूर्य के करीब से गुजरा, जिसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से सूर्य के धरातल से असंख्य छोटे कण (ग्रहाणु) बाहर निकल गए। इन्हीं कणों के आपस में जुड़ने (Accretion) से ग्रहों का निर्माण हुआ।
- जेम्स जींस और हेरोल्ड जेफरीज की ज्वारीय परिकल्पना (1919/1921): सूर्य के पास से एक विशाल तारे के गुजरने पर सूर्य की सतह से एक सिगार के आकार का गैसीय पदार्थ 'फिलामेंट' बाहर खिंच गया। तारे के दूर जाने पर यह टूटकर ग्रहों में बदल गया।
- रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis): आरंभ में सूर्य के साथ उसका एक साथी तारा भी था। एक तीसरे विशाल तारे के आने से साथी तारे में ज्वारीय उद्भेदन हुआ, जिससे ग्रहों का निर्माण हुआ। यह सूर्य और ग्रहों के बीच की दूरी और कोणीय संवेग की सही व्याख्या करता है।
3. आधुनिक और जटिल परिकल्पनाएँ
ये सिद्धांत पारंपरिक परिकल्पनाओं की कमियों को दूर करने के लिए नाभिकीय भौतिकी और आधुनिक खगोल विज्ञान का सहारा लेते हैं।
- ऑटो श्मिट की अंतरतारक धूल परिकल्पना (1943): जब सूर्य आकाशगंगा के करीब से गुजर रहा था, तो उसने गैसीय मेघ और धूल कणों को अपनी ओर आकर्षित किया। ये संघनित होकर ग्रहों में बदल गए। यह आंतरिक ठोस और बाह्य गैसीय ग्रहों की संरचना को भली-भांति समझाता है।
- फ्रेड हॉयल व लिटिलटन की सुपरनोवा परिकल्पना (1939): सूर्य का एक साथी तारा 'सुपरनोवा' था, जिसमें भयंकर विस्फोट हुआ और इसके मलबे से ग्रहों का निर्माण हुआ। यह ग्रहों के उच्च घनत्व (भारी तत्वों के निर्माण) और सूर्य से दूरी को सर्वाधिक सक्षम रूप से समझाता है।
महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न
स्व-मूल्यांकन हेतु उच्च-स्तरीय विश्लेषणात्मक प्रश्न:
- पृथ्वी की उत्पत्ति से संबंधित 'अद्वैतवादी' और 'द्वैतवादी' संकल्पनाओं के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: (i) कांट और लाप्लास की परिकल्पनाएँ अद्वैतवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं。 (ii) द्वैतवादी संकल्पना में ग्रहों के निर्माण के लिए सूर्य के साथ किसी अन्य तारे की उपस्थिति को अनिवार्य नहीं माना गया है। उत्तर: केवल कथन (i) सही है।
- कोणीय संवेग (Angular Momentum) के संरक्षण और ग्रहों के घनत्व की समस्या का सर्वाधिक वैज्ञानिक रूप से समाधान करने वाली 'सुपरनोवा परिकल्पना' का प्रतिपादन किसने किया था? उत्तर: फ्रेड हॉयल और लिटिलटन
- 'सिगार' के आकार के फिलामेंट के टूटने से ग्रहों की उत्पत्ति (जिसमें मध्य के ग्रह विशाल और किनारों के ग्रह छोटे होते हैं) का सिद्धांत किस परिकल्पना का मूल आधार है? उत्तर: ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis)
मुख्य वर्णनात्मक अभ्यास प्रश्न (Descriptive Practice Questions)
गहन विश्लेषण और मुख्य परीक्षा अभ्यास हेतु प्रश्न:
- प्रश्न 1: अद्वैतवादी और द्वैतवादी संकल्पनाओं के बीच मूलभूत सैद्धांतिक अंतर को स्पष्ट करते हुए, ग्रहों की उत्पत्ति में 'कोणीय संवेग (Angular Momentum)' की समस्या का मूल्यांकन करें। Short Answer Summary: अद्वैतवादी (एकल पिंड, जैसे कांट-लाप्लास) और द्वैतवादी (दो या अधिक तारे, जैसे जींस-जेफरीज) के मध्य विभेद करें। कोणीय संवेग की समस्या यह है कि अद्वैतवादी सिद्धांतों के अनुसार सूर्य की घूर्णन गति अत्यंत तीव्र होनी चाहिए थी, लेकिन सौरमंडल का 98% कोणीय संवेग ग्रहों में है। द्वैतवादी और आधुनिक सिद्धांतों ने यह स्पष्ट किया कि ग्रहों का निर्माण किसी अन्य तारे के मलबे या ज्वारीय उद्भेदन से हुआ, जिससे उनका कोणीय संवेग सूर्य से स्वतंत्र रूप से अधिक हो सका।
- प्रश्न 2: फ्रेड हॉयल और ऑटो श्मिट की आधुनिक परिकल्पनाओं ने किस प्रकार पारंपरिक सिद्धांतों की कमियों (जैसे ग्रहों का घनत्व और दूरी) को दूर किया? विश्लेषणात्मक विवरण दें। Short Answer Summary: पारंपरिक सिद्धांत यह नहीं समझा सके कि आंतरिक ग्रह भारी और ठोस तत्वों से क्यों बने हैं। ऑटो श्मिट की परिकल्पना बताती है कि भारी कण सूर्य के करीब एकत्रित होकर ठोस ग्रहों में बदल गए। फ्रेड हॉयल की 'सुपरनोवा परिकल्पना' सिद्ध करती है कि भारी तत्वों का निर्माण केवल सुपरनोवा विस्फोट के तापमान में ही संभव है। अतः साथी तारे के विस्फोट से उच्च घनत्व वाले ग्रहों का निर्माण हुआ और विस्फोट के धक्के ने ग्रहों को वर्तमान दूरी पर स्थापित कर दिया।