पृथ्वी की गतियाँ: एक व्यापक भू-भौतिकीय विश्लेषण

Holash kumar

पृथ्वी की गतियाँ: एक व्यापक भू-भौतिकीय विश्लेषण



(Motions of the Earth: A Comprehensive Geophysical Analysis)

पृथ्वी ब्रह्मांड में स्थिर नहीं है। इसकी गतियों को दो प्राथमिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाता है, जो हमारे पर्यावरण, समय और जीवन को निर्धारित करती हैं।

1. घूर्णन या परिभ्रमण (Rotation) – पृथ्वी की दैनिक गति



जब पृथ्वी अपने काल्पनिक अक्ष (Axis) पर पश्चिम से पूर्व (Anti-clockwise) दिशा में घूमती है, तो इसे घूर्णन कहते हैं।

तकनीकी विवरण और UPSC दृष्टिकोण:
  • अक्षीय झुकाव का महत्त्व: पृथ्वी का अक्ष सीधा नहीं है, बल्कि यह अपने कक्षीय तल (Orbital Plane) से 66.5° का कोण बनाता है और लंबवत रेखा (Vertical Line) से 23.5° झुका हुआ है। यह झुकाव ही ऋतु परिवर्तन का आधार है।
  • नक्षत्र दिवस (Sidereal Day): एक घूर्णन पूरा करने में पृथ्वी को सटीक रूप से 23 घंटे, 56 मिनट और 4.09 सेकंड लगते हैं। हम सुविधा के लिए इसे 24 घंटे (सौर दिवस) मानते हैं।
  • प्रदीप्ति वृत्त (Circle of Illumination): चूँकि पृथ्वी 'भू-आभ' (Geoid - ध्रुवों पर चपटी) है, सूर्य की किरणें हर जगह एक साथ नहीं पहुँचतीं। वह सीमा रेखा जो दिन (प्रकाशित भाग) और रात (अंधकार भाग) को अलग करती है, प्रदीप्ति वृत्त कहलाती है। यह वृत्त कभी भी अक्ष (Axis) के समानांतर नहीं होता, बल्कि मौसम के अनुसार बदलता रहता है।

घूर्णन के भू-भौतिकीय प्रभाव (Geophysical Impacts):

  • दिन-रात का चक्र: घूर्णन के कारण ही किसी स्थान पर सूर्य का उदय और अस्त होना संभव होता है।
  • कोरिओलिस बल (Coriolis Force): यह सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है। घूर्णन के कारण एक आभासी बल (Deflective Force) उत्पन्न होता है।
    • नियम: यह पवनों और महासागरीय धाराओं को उत्तरी गोलार्द्ध में दाईं ओर (Right) और दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर (Left) विक्षेपित करता है। (फेरल का नियम)।
  • ज्वारीय तरंगें: घूर्णन गति समुद्र में ज्वार-भाटा की दैनिक आवृत्ति तय करती है।
  • दिशानिर्देशन: चुंबकीय ध्रुवों और भौगोलिक ध्रुवों की अवधारणा घूर्णन पर ही आधारित है।

2. परिक्रमण (Revolution) – पृथ्वी की वार्षिक गति



पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमते हुए सूर्य के चारों ओर एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा (Elliptical Orbit) में परिक्रमा करती है।

कक्षीय गतिकी (Orbital Dynamics):

  • अवधि: 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट, 46 सेकंड। (यही अतिरिक्त ~6 घंटे 4 साल में मिलकर एक 'लीप वर्ष' का निर्माण करते हैं)।
  • उपसौर (Perihelion): 3 जनवरी के आसपास पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट (147.5 मिलियन किमी) होती है। इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मी अधिक तेज होनी चाहिए, लेकिन महासागरीय विस्तार के कारण यह प्रभाव संतुलित हो जाता है।
  • अपसौर (Aphelion): 4 जुलाई के आसपास पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर (152.6 मिलियन किमी) होती है।

3. ऋतु परिवर्तन की क्रियाविधि (Mechanism of Seasons)



UPSC मुख्य परीक्षा में प्रश्न आता है: "यदि पृथ्वी का अक्ष झुका हुआ नहीं होता, तो जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता?" उत्तर है: कोई ऋतु परिवर्तन नहीं होता।

ऋतुएँ बदलने के दो मुख्य कारण हैं:

  • पृथ्वी का अक्षीय झुकाव (23\frac{1}{2}^{\circ})।
  • सूर्य के चारों ओर परिक्रमण।

सूर्य के सापेक्ष पृथ्वी की चार महत्वपूर्ण स्थितियाँ:

A. ग्रीष्म अयनांत (Summer Solstice) – 21 जून

  • घटना: सूर्य की किरणें कर्क रेखा (23.5°N) पर लंबवत पड़ती हैं।
  • प्रभाव: उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे लंबा दिन और सबसे छोटी रात।
  • आर्कटिक वृत्त: 66.5° N के उत्तर में 24 घंटे का दिन रहता है (Midnight Sun की घटना)।
  • भारत के संदर्भ में: इस समय भारत में भीषण गर्मी होती है और निम्न दाब का क्षेत्र (Low Pressure) बनता है, जो मानसून को आकर्षित करता है।

B. शीत अयनांत (Winter Solstice) – 22 दिसंबर

  • घटना: सूर्य की किरणें मकर रेखा (23.5° S) पर लंबवत पड़ती हैं।
  • प्रभाव: उत्तरी गोलार्द्ध में सबसे छोटी रात और सर्दी। दक्षिणी गोलार्द्ध में यह समय गर्मियों का होता है (क्रिसमस गर्मियों में मनाया जाता है - ऑस्ट्रेलिया में)।

C. विषुव (Equinox) – 21 मार्च और 23 सितंबर

  • घटना: सूर्य की किरणें सीधे विषुवत रेखा (Equator) पर पड़ती हैं।
  • प्रभाव: पूरी पृथ्वी पर दिन और रात की अवधि बराबर (12-12 घंटे) होती है। इस समय न तो उत्तरी ध्रुव और न ही दक्षिणी ध्रुव सूर्य की ओर झुका होता है।

4. ग्रहण एवं आकाशीय परिघटनाएँ (Eclipses & Celestial Phenomena)



ग्रहण प्रकाश के सीधी रेखा में गमन (Rectilinear propagation) का परिणाम है।

सूर्यग्रहण (Solar Eclipse)

  • युति (Conjunction): जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है।
  • विशेष स्थिति: यह केवल अमावस्या (New Moon) को होता है।
  • नोट: हर अमावस्या को सूर्यग्रहण नहीं होता क्योंकि चंद्रमा का कक्षीय तल पृथ्वी के कक्षीय तल से 5^{\circ} झुका हुआ है। ग्रहण तभी होता है जब वे 'नोड्स' (Nodes) पर मिलते हैं।

चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse)

  • वियुति (Opposition): जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है।
  • विशेष स्थिति: यह केवल पूर्णिमा (Full Moon) को होता है।
आधुनिक शब्दावली (Current Trends):
  • सुपरमून (Supermoon): जब चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के निकटतम बिंदु (Perigee) पर होता है। यह सामान्य से बड़ा और चमकीला दिखता है।
  • ब्लू मून: एक कैलेंडर महीने में दूसरी पूर्णिमा। (नीले रंग से कोई संबंध नहीं)।
  • ब्लड मून: पूर्ण चंद्रग्रहण के दौरान पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरने वाली सूर्य की लाल किरणें (लंबी तरंगदैर्ध्य) चंद्रमा पर पड़ती हैं, जिससे वह लाल/तांबे जैसा दिखता है। चार लगातार ब्लड मून की घटना को 'टेट्राड' (Tetrad) कहते हैं।

5. ज्वार-भाटा (Tides): गुरुत्वाकर्षण का नृत्य



महासागरीय जल का नियमित रूप से ऊपर उठना (ज्वार) और नीचे गिरना (भाटा) ज्वार-भाटा कहलाता है।

उत्पत्ति के कारक (Forces Involved):

  • गुरुत्वाकर्षण बल: चंद्रमा का बल सूर्य की तुलना में दोगुना प्रभावी होता है (निकटता के कारण)।
  • अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force): पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न बल जो पानी को बाहर की ओर धकेलता है।

ज्वार के प्रकार:

  • दीर्घ/वृहत ज्वार (Spring Tides):
    • सिजिगी (Syzygy) अवस्था: जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में हों (युति या वियुति)।
    • परिणाम: उच्चतम ज्वार (सामान्य से 20% अधिक)।
    • समय: पूर्णिमा और अमावस्या।
  • लघु ज्वार (Neap Tides):
    • समकोण स्थिति: जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी के संदर्भ में 90^{\circ} का कोण बनाते हैं।
    • परिणाम: सूर्य और चंद्रमा के बल एक-दूसरे को काटते (Counteract) हैं, जिससे निम्न ज्वार आता है।
    • समय: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की सप्तमी/अष्टमी।
समय में देरी (Time Lag) का कारण: UPSC में अक्सर पूछा जाता है कि ज्वार प्रतिदिन 52 मिनट देरी से क्यों आता है?
  • पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है।
  • लेकिन इस दौरान चंद्रमा भी अपनी कक्षा में आगे बढ़ जाता है।
  • चंद्रमा को उसी स्थान के ठीक ऊपर दोबारा आने के लिए पृथ्वी को थोड़ा और घूमना पड़ता है, जिसमें लगभग 52 मिनट का अतिरिक्त समय लगता है।

आर्थिक एवं पारिस्थितिक महत्त्व:

  • नेविगेशन: कांडला (गुजरात) और हुगली (प. बंगाल) जैसे ज्वारीय बंदरगाहों में जहाजों को प्रवेश करने के लिए उच्च ज्वार की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
  • पारिस्थितिकी: ज्वार नदमुखों (Estuaries) से प्रदूषकों को समुद्र में बहा ले जाते हैं और मैंग्रोव वनों के पोषण में मदद करते हैं।
  • ऊर्जा: ज्वारीय ऊर्जा (Tidal Energy) नवीकरणीय ऊर्जा का एक स्रोत है।

UPSC CSE Mains के लिए "पृथ्वी की गतियाँ" विषय से संबंधित 3 अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1: भू-भौतिकी और वायुमंडलीय परिसंचरण (Geophysics and Atmospheric Circulation)

Q1. "पृथ्वी का घूर्णन (Rotation) केवल दिन-रात का कारक नहीं है, बल्कि यह वायुमंडलीय परिसंचरण के 'त्रि-कोशिकीय मॉडल' (Tri-cellular Model) का मुख्य चालक है।" कोरिओलिस बल की भूमिका को स्पष्ट करते हुए समझाइए कि भूमध्य रेखा पर उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की अनुपस्थिति का भू-भौतिकीय कारण क्या है?

उत्तर की रूपरेखा (Approach):
  • परिचय (Introduction):
    • स्पष्ट करें कि यदि पृथ्वी स्थिर होती, तो वायुमंडलीय परिसंचरण केवल एक कोष्ठ (Single Cell - हैडली सेल) का होता (ध्रुवों से भूमध्य रेखा तक)।
    • घूर्णन के कारण कोरिओलिस बल (Coriolis Force) उत्पन्न होता है, जो हवाओं को विक्षेपित करता है।
  • मुख्य भाग (Body):
    • त्रि-कोशिकीय मॉडल: समझाएं कि कैसे कोरिओलिस बल हवा को मोड़कर उसे 30° और 60° अक्षांशों पर नीचे उतरने या ऊपर उठने के लिए बाध्य करता है, जिससे हैडली, फेरल और पोलर सेल बनते हैं।
    • चक्रवात निर्माण की शर्त: चक्रवात के लिए हवा का निम्न दाब केंद्र (Low Pressure Center) के चारों ओर घूमना आवश्यक है।
    • भूमध्य रेखा पर शून्य कोरिओलिस: गणितीय रूप से, कोरिओलिस बल Fc = 2vΩ sinφ होता है (जहाँ φ अक्षांश है)। भूमध्य रेखा पर φ = 0°, sin(0) = 0 होता है।
    • अतः, भूमध्य रेखा (0° से 5° N/S) पर हवा मुड़ने के बजाय सीधे निम्न दाब को भर देती है (Fill the gap), जिससे 'चक्रवात की आँख' (Eye of the storm) विकसित नहीं हो पाती।
  • निष्कर्ष (Conclusion):
    • यही कारण है कि शक्तिशाली तूफान (Typhoons/Cyclones) हमेशा विषुवत रेखा से थोड़ा दूर (8°-20° अक्षांश) बनते हैं, जहाँ कोरिओलिस बल पर्याप्त होता है।

प्रश्न 2: जलवायु विज्ञान और मानसून (Climatology and Monsoon Mechanism)

Q2. "अयनांत और विषुव (Solstice and Equinox) की स्थितियाँ केवल खगोलीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे अंत:उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) के दोलन को निर्धारित करती हैं।" भारतीय मानसून की उत्पत्ति और तीव्रता पर ITCZ के उत्तरायण और दक्षिणायन के प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

उत्तर की रूपरेखा (Approach):
  • परिचय (Introduction):
    • पृथ्वी के परिक्रमण (Revolution) और अक्षीय झुकाव (Tilt) को सूर्य के आभासी संचलन (Apparent movement) से जोड़ें।
    • परिभाषित करें कि ITCZ वह निम्न दाब की पेटी है जहाँ उत्तर-पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनें मिलती हैं।
  • मुख्य भाग (Body):
    • ग्रीष्म अयनांत (21 जून) और मानसून का आगमन: जब सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत होता है, तो ITCZ उत्तर की ओर खिसककर गंगा के मैदान (20°-25° N) तक पहुँच जाता है (जिसे Monsoon Trough कहते हैं)। यह निम्न दाब हिंद महासागर की उच्च दाब वाली हवाओं को आकर्षित करता है।
    • दक्षिणी दोलन और जेट स्ट्रीम: विश्लेषण करें कि कैसे ITCZ का यह खिसकाव 'उष्णकटिबंधीय ईस्टरली जेट' (TEJ) को सक्रिय करता है।
    • शीत अयनांत और मानसून निवर्तन: जब सूर्य मकर रेखा की ओर जाता है, ITCZ दक्षिण की ओर खिसक जाता है, जिससे पवन की दिशा उलट जाती है (North-East Monsoon)।
    • आलोचनात्मक बिंदु: केवल ITCZ ही जिम्मेदार नहीं है; अल-नीनो (El Nino) और इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) भी इस तंत्र को बाधित या प्रबल करते हैं।
  • निष्कर्ष (Conclusion):
    • निष्कर्षतः, भारतीय कृषि और अर्थव्यवस्था पृथ्वी की कक्षीय स्थिति और ITCZ के नाजुक संतुलन पर टिकी है।

प्रश्न 3: दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन (Paleoclimatology)

Q3. "पृथ्वी की कक्षीय गतियाँ स्थिर नहीं हैं, बल्कि चक्रीय रूप से परिवर्तित होती रहती हैं (मिलानकोविच चक्र)।" चर्चा कीजिए कि पृथ्वी की उत्केंद्रता (Eccentricity), अक्षीय झुकाव (Obliquity) और पुरस्सरण (Precession) में दीर्घकालिक परिवर्तन कैसे पृथ्वी पर 'हिमयुगों' (Ice Ages) और 'ग्लेशियल-इंटरग्लेशियल चक्रों' को प्रेरित करते हैं?

उत्तर की रूपरेखा (Approach):
  • परिचय (Introduction):
    • बताएं कि हजारों वर्षों के पैमाने पर, पृथ्वी की गतियाँ बदलती रहती हैं। इसे सर्बियाई वैज्ञानिक मिलुटिन मिलानकोविच ने समझाया था। यह प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारक है।
  • मुख्य भाग (Body) - तीन चक्रों का विश्लेषण:
    • उत्केंद्रता (Eccentricity - 1,00,000 वर्ष): पृथ्वी की कक्षा कभी गोल (Circular) होती है तो कभी अधिक अंडाकार (Elliptical)। अधिक अंडाकार होने पर सूर्य से दूरी में बड़ा अंतर आता है, जिससे सौर विकिरण (Insolation) प्रभावित होता है।
    • अक्षीय झुकाव (Obliquity - 41,000 वर्ष): पृथ्वी का झुकाव 22.1^\circ से 24.5^\circ के बीच बदलता है।
      • कम झुकाव = कम मौसमी अंतर = ध्रुवों पर सर्दियाँ थोड़ी गर्म, लेकिन गर्मियाँ बहुत ठंडी। इससे बर्फ पिघल नहीं पाती और हिमयुग (Ice Age) की शुरुआत होती है।
    • पुरस्सरण (Precession - 26,000 वर्ष): पृथ्वी का अक्ष एक लट्टू की तरह डगमगाता (Wobble) है। यह तय करता है कि पृथ्वी सूर्य के सबसे पास (Perihelion) कब होगी (सर्दियों में या गर्मियों में)।
  • निष्कर्ष (Conclusion):
    • इन चक्रों का संयुक्त प्रभाव यह तय करता है कि पृथ्वी को कितनी सौर ऊर्जा मिलेगी। वर्तमान ग्लोबल वार्मिंग (मानव-जनित) इन प्राकृतिक चक्रों की तुलना में बहुत तेज है, लेकिन इन चक्रों का अध्ययन पृथ्वी के जलवायु इतिहास को समझने के लिए अनिवार्य है।

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